ग्राउंड रिपोर्टराजनीति

उम्मीदवारी और दावेदारी के लिए रोमांचक जंग जारी

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द जनमित्र | बिमल कुमार

बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है, और बक्सर में इसकी गूंज धीरे-धीरे तेज हो रही है। ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरों से सजा यह शहर न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है, बल्कि सियासी नजरिए से भी उतना ही महत्वपूर्ण है। गंगा के किनारे बसे बक्सर की सियासत में इस बार भी हलचल मची है। एक तरफ सत्ताधारी और विपक्षी दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ उम्मीदवारी की दौड़ में शामिल चेहरे अपनी किस्मत आजमाने के लिए हरसंभव जतन कर रहे हैं। बक्सर विधानसभा सीट पर कब्जा जमाने की इस जंग में हर कोई अपनी ताकत झोंक रहा है, और सियासी समीकरणों का यह खेल रोमांचक होता जा रहा है।


वर्तमान में बक्सर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के संजय कुमार तिवारी काबिज हैं। वो इस बार भी अपनी सीट बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेंगे। उनकी नजर उन मतदाताओं पर टिकी है, जो पिछले चुनाव में उनके साथ खड़े थे। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस सीट को अपनी झोली में डालने के लिए बेताब है। भाजपा का मकसद ऐसा उम्मीदवार उतारना है, जो न केवल वर्तमान विधायक को कड़ी टक्कर दे सके, बल्कि जीत का परचम भी लहराए। मगर, जैसा कि भाजपा की पुरानी परंपरा रही है, पार्टी अभी तक अपने उम्मीदवार के नाम पर मुहर नहीं लगा पाई है। यह अनिश्चितता ही बक्सर की सियासत में रोमांच का तड़का लगा रही है।


भाजपा का इतिहास रहा है कि वह अपने उम्मीदवारों को आखिरी वक्त में ‘सरप्राइज’ की तरह पेश करती है। 2020 में परशुराम चौबे और 2015 में प्रदीप दुबे जैसे नाम इसके गवाह हैं। यह रणनीति भले ही मतदाताओं के लिए चौंकाने वाली हो, लेकिन पार्टी के भीतर उम्मीदवारी की दावेदारी करने वालों के लिए यह किसी जंग से कम नहीं। बक्सर में इस बार भी कई चेहरे भाजपा के टिकट के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। कोई अपनी सनातनी छवि को चमकाने में जुटा है, तो कोई सामाजिक कार्यों के जरिए जनता का दिल जीतने की कोशिश में है। सनातन धर्म का एजेंडा भाजपा के लिए हमेशा से तुरुप का पत्ता रहा है, और शायद यही वजह है कि कई दावेदार खुद को सनातन का सबसे बड़ा पैरोकार साबित करने में जुटे हैं।

कोई भव्य धार्मिक जुलूस निकालकर अपनी ताकत दिखा रहा है, तो कोई हेलिकॉप्टर से फूलों की बारिश कराकर भक्तों का ध्यान खींच रहा है। कोई स्वास्थ्य शिविर लगाकर जनसेवा का चोला ओढ़ रहा है, तो कोई खुद को ‘बक्सर का बेटा’ बताकर स्थानीय भावनाओं को भुनाने की कोशिश में है। इस सियासी मंच पर हर कोई अपने-अपने तरीके से पार्टी हाईकमान को लुभाने की जुगत में है। व्यवसायी, सामाजिक कार्यकर्ता, और अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग इस दौड़ में शामिल हैं, और कही-न-कही सबका एक ही मकसद है—भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुना जाना।
बक्सर के तकरीबन तीन लाख मतदाताओं का दिल जीतने से पहले, इन दावेदारों को पार्टी का भरोसा जीतना होगा। यह आसान नहीं है, क्योंकि किसी भी पार्टी की चयन प्रक्रिया में कई स्तरों पर मंथन होता है। पार्टी न केवल स्थानीय समीकरणों को देखती है, बल्कि जातिगत गणित, उम्मीदवार की छवि, और जीत की संभावना जैसे पहलुओं पर भी गौर करती है। ऐसे में, जो दावेदार अपनी बात को मजबूती से रख पाएंगे, उनके लिए रास्ता आसान हो सकता है। लेकिन यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि आखिरकार भाजपा का ‘सरप्राइज’ इस बार कौन होगा?
बक्सर की जनता भी इस सियासी नाटक को बड़े गौर से देख रही है। यहाँ के मतदाता न केवल स्थानीय मुद्दों, बल्कि उम्मीदवारों की विश्वसनीयता और उनके पिछले कामकाज को भी तरजीह देते हैं। पौराणिक रामरेखा घाट, और बक्सर के ऐतिहासिक किले की तरह यहाँ की सियासत भी अपनी एक अलग पहचान रखती है। यहाँ का हर चुनाव न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि राज्य की सियासत में भी अपनी छाप छोड़ता है।
इस बार का चुनाव कई मायनों में खास होने जा रहा है। एक तरफ कांग्रेस अपनी साख बचाने की कोशिश में है, तो दूसरी तरफ भाजपा इस सीट को छीनकर अपनी ताकत बढ़ाना चाहती है। अन्य दल भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे। ऐसे में, बक्सर की जनता किसे अपना नुमाइंदा चुनती है, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है, और हर कोई उस पल का इंतजार कर रहा है जब भाजपा अपने उम्मीदवार का ऐलान करेगी। तब तक, यह सियासी जंग और तेज होने वाली है। बक्सर की धरती पर एक बार फिर सियासत का नया अध्याय लिखा जाना तय है।

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