सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं के परिजन शिक्षकों से मांग रहे है स्कूल में सुरक्षा की लिखित गारंटी नही देने पर बच्चो ने स्कूल जाना किया बन्द. व्यवस्था और इम्फरा स्ट्रक्चर को सुधारने के लिए नही बल्कि सुर्खिया में बने रहने के लिए तूफानी दौरे कर रहे है के के पाठक. मौत के साये में सर पर हेलमेट पहनकर शिक्षक कर रहे है सरकारी विद्यालय में काम.
द जनमित्र | सरिता कुमारी
बक्सर: ज्ञान की भूमि कहे जाने वाले बिहार के शिक्षा विभाग पिछले कई महीनों से चर्चाओ में है. कभी शिक्षक भर्ती को लेकर तो कभी नियुक्ति और नए नियमावली को लेकर, रोजना अखबार टीवी और सोशल मीडिया में हेडलाइन बन रहा है. शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव के के पाठक बिहार के अलग अलग जिलों में तूफानी दौरा कर रहे है. लेकिन उनके इस तूफानी दौरे में सुधार कम और सुर्खिया ज्यादा नजर आ रहा है. यही कारण है कि के के पाठक को तो मीडिया में जगह आसानी से मिल जा रहा है. लेकिन उस समस्याओं को दूर करने के लिए कोई उपाये नही किया जा रहा है, जो स्कूल प्रशासन के द्वारा बताया जा रहा है. अपर मुख्य सचिव के तूफानी दौरे से स्कूल की व्यवस्था में कितना बदलाव हो रहा है, इसका जमीनी हकीकत हम बक्सर में दिखा रहे है. जंहा के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र के परिजन स्कूल के शिक्षकों से लिखित रूप में स्कूल के अंदर बच्चो की सुरक्षा का गारंटी मांग रहे है, जिसे देने में शिक्षक असमर्थ है और जिसका परिणाम है कि बच्चे इस हादीपुर प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाना ही छोड़ दिये है. कभी पूरे स्कूल में पांच तो कभी तीन बच्चे ही पढ़ने के लिए आ रहे है. आलम यह है कि स्कूल के शिक्षक सर पर हेलमेट पहनकर विद्यालय में पठन पाठन का कार्य कर रहे है. स्कूल के बच्चों ने बताया कि घर के लोग के मना करने के बाद भी हम पढ़ने आये है क्योंकि हमें पढ़ना है. लेकिन स्कूल की भवन शरीर पर न गिर जाए डर भी लगता है.

भ्रष्टाचार से का भेंट चढ़ा विद्यालय
बर्ष 2008 में ही इस प्राथमिक विद्यालय हादीपुर का निर्माण कराया गया था. इसके कुछ साल बाद से ही इस स्कूल के भवन का छत गिरने लगा छज्जा गिरने लगा. जिसकी लिखित शिकायत 2015 से ही स्कूल प्रबंधक शिक्षा विभाग के अधिकारियों से करते आ रहे हैं. लेकिन इस भ्रष्टाचार के खेल में शामिल कोई भी अधिकारियों ने ना तो इसकी मरम्मत कराने की जहमत उठाई और ना ही भ्रष्टाचार करने वाले ठेकेदारों और शिक्षा विभाग के कर्मियो पर कार्रवाई की. आलम यह है कि अब इस सरकारी स्कूल में बच्चे पढ़ने भी नहीं आ रहे हैं. ग्रामीणों की माने तो स्कूल की छत कब जमीनदोज हो जाए कहना मुश्किल है. इस विद्यालय में हम अपने बच्चो को भेजकर उनके जान जोखिम में नही डाल सकते है. यदि शिक्षक लिखित रूप से स्कूल के बच्चों की सुरक्षा का गारंटी दे तभी हमलोग स्कूल में अपने-अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजेंगे.

वही स्कूल के शिक्षकों की माने तो पिछले कई सालों से इस स्कूल का सीलिंग एवं दीवाल गिर रहा है. जिसके कारण वह विद्यालय के अंदर हेलमेट पहनकर पठन पाठन का कार्य कर रहे है. छत का सरिया तक दिखाई दे रहा है. स्कूल प्रशासन के द्वारा इस बात की लिखित शिकायत
बर्ष 2015 से ही विभाग से किया जा रहा है लेकिन विभाग के बड़े अधिकारियों का इस पर कोई ध्यान नहीं है. आलम यह है कि ग्रामीणों के दरवाज़े पर जाने के बाद भी वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार नही है. और सुरक्षा का लिखित गारंटी मांग रहे है. विभाग का आदेश है कि तीन दिनों तक जो बच्चे लगातार विद्यालय नही आ रहे है उनका नामांकन काट दिया जाए. सड़क किनारे स्कूल की महंगी जमीन पर भू माफियाओ की भी निगाहे टिकी हुई है और वह इस फिराक में है कि कब स्कूल का भवन गिर जाए और पठन पाठन का काम बंद हो जाये कि वह इस जमीन पर कब्जा कर सके.

गौरतलब है कि बिहार के शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के बजाए बिहार के शिक्षा मंत्री रामचरितमानस के चौपाई को पोटेशियम साइनाइड बताने में लगे हुए हैं और विभाग के अपर मुख्य सचिव तूफानी दौरा कर केवल सुर्खियां बटोर रहे हैं. लेकिन हालात यह है कि राज्य सरकार कुल बजट के लगभग 23 प्रतिशत राशि शिक्षा में सुधार करने के लिए खर्च करती है. उस सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में न बिजली की कनेक्शन है और न ही भवन है. शिक्षाविदों की माने तो जिस दिन राज्य सरकार स्कूलों की दशा ठीक कर देगी उसी दिन शिक्षा माफिया सरकार को ही गिरा देंगे. क्योंकि जब सरकारी स्कूलो कि दशा सुधर जाएगी तो निजी स्कूलों की कमाई पर ताला लग जायेगा, जिसके लिए निजी स्कूल वाले चंदा के रूप में सरकार को अरबो रुपये की डोनेशन देते है.

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