बक्सर सदर अस्पताल में आईसीयू बनकर है तैयार, फीर भी किसका हो रहा है इलाज के लिए इंतजार. सप्ताह में 6 दिन की जगह 2-3 दिन ड्यूटी कर आखिर स्वास्थ्यकर्मी क्यो रहते है फरार.
द जनमित्र | डेस्क
बक्सर- जिले के स्वास्थ्य महकमा वेंटिलेटर पर अपना अंतिम सांस गिन रहा है. सरकार द्वारा तमाम संसाधनो को उपलब्ध कराने के बाद भी जिले के सरकारी अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों की रवैये में कोई बदलाव नही आ रहा है. आलम यह है कि जिन स्वाथ्यकर्मियो को सप्ताह में 6 दिन ड्यूटी कर मरीजो का उपचार करने की जिम्मेवारी सरकार ने दी है उसमें से अधिकांश सप्ताह में 2-3 दिन से अधिक ड्यूटी करना अपने शान के खिलाफ समझते है. यदि इनकी शिकायत किसी ने कर दी तो मानो वह कितना बड़ा अपराध कर दिया हो और उसका पर्ची तक फेक दिया जाता है.

बाहरी दवा जरूरी या मजबूरी
बक्सर सदर प्रखंड के बोक्सा गांव निवासी साहेब पासवान महादलित परिवार से आते है. छत से गिर जाने के बाद उनके परिजनों ने उन्हें सदर अस्पताल में पहुँचाया. तमाम प्रयास के बाद भी जब वह खुद से जांच नही करा पाए तो उन्होंने इसकी सूचना स्थानीय पत्रकारों को दी जिसके बाद तमाम जांच के साथ चिकित्सको ने उपचार भी किया.
किसी खास दुकान पर ही मिलती है अस्पताल की खास दवा
जिस मेडिसिन की जरूरत मरीज को थी. उसमें से दो-तीन दवाइयों को छोड़कर सभी दवा बाहर का लिख दिया गया. सस्ते की चक्कर में पूरे शहर का चक्कर लगाने के बाद मेडिकल दुकानदार दवा के उस पर्ची को भी नही पढ़ पाए, जिसे चिकित्सक ने लिखी थी. हारकर पुनः परिजन जब अस्पताल पहुँचे तब तक चिकित्सक चले गए थे. वही ड्यूटी दे रहे एक सफाइकर्मी ने बताया कि हॉस्पिटल के सामने का ही मेडिकल दुकानदार इस पर्ची को समझ पायेगा. वहाँ जाने के बाद 2 दिन के लिए 1500 मूल्य की दवा उस दुकानदार ने थमा दी. ऐसे में सवाल उठता है कि टूटी हुई हड्डियो को दो दिन में जोड़ देने की क्षमता रखने वाले इस औषधि की जब इतनी ही जरूरत थी तो मरीज को हॉस्पिटल में भर्ती कर इलाज क्यो नही किया गया. मजबूरन वह मरीज अस्पताल को तौबा कर कृष्णाब्रह्म में जाकर अपने पैर में कमाची बंधवाया और अपने घर पर बैठकर अपनी गरीबी को कोस रहा है.

क्या कहते है मरीज के परिजन
मजदूरी कर अपने परिवार का भरणपोषण करने वाले मरीज के भाई टाली पासवान ने बताया की पुनः उस अस्पताल में जाने की हिम्मत हम नही जुटा पाए और पैर को प्लास्टर कराने के बजाए उसे कमाची लगाकर बंधवाया है. आर्थिक स्थिति ठीक नही है कि प्लास्टर कराने की समाग्री और इतनी महंगी दवा खरीद सके.
क्या कहते है सिविल सर्जन
वही इस मामले को लेकर जब पत्रकारों ने जिले के सिविल सर्जन सुरेश चंद्र सिन्हा को उस दवा की पर्ची भेजकर उनसे बात की तो उन्होंने बताया कि मामले को वह खुद देखेंगे कि आखिर ऐसा क्यों हुआ किस परिस्थिति में बाहर की दवा लिखी गई.

गौरतलब है कि स्वास्थ्य विभाग के द्वारा सभी सरकारी अस्पतालों को यह निर्देशित किया गया है कि अस्पताल में उपलब्ध दवा ही मरीज को लिखनी है. अति आवश्यक होने के बाद ही बाहरी दवा को लिखा जाएगा. जिसकी पूरी जानकारी स्वास्थ्य विभाग के पोर्टल पर भी चढ़ानी होगी. सरकार के इस नियमो का कितना पालन हो रहा है यह तो विभागीय लोग ही बताएंगे. आलम यह है कि सदर अस्पताल में 10 बेड का आईसीयू बनकर तैयार होने के बाद भी इसका ताला तक नही खुल पाया.

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