स्थानीय

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अजय मिश्रा, बक्सर

पिछले साल राष्ट्रीय समाचार पत्र दैनिक भास्कर के स्थानीय बक्सर संस्करण में एक खबर छपी की बक्सर ज़िले के एक कस्बे कोरान सराय में एक ही परिवार के तीन बच्चों की मौत भुखमरी के कारण हो गई है। इस ख़बर पर जैसे की स्वाभाविक प्रतिक्रिया आनी चाहिए आई खबर ने हर संवेदनशील व्यक्ति को हिला कर रख दिया क्योंकि भूख से किसी भी मौत की बक्सर में ये पहली ही घटना सुनने में आई थी। ज़ाहिर सी बात है सरकार और सिस्टम को लोग अपने अपने तरीके से कोसने लगे।

अगले दिन एक दूसरे राष्ट्रीय समाचार पत्र के स्थानीय संस्करण में ये खबर छपी की भास्कर द्वारा जो खबर लोगों तक पहुंचाई गई वो गलत थी दर असल उन बच्चों की मौत एक रहस्यमयी बीमारी से हुई है न कि भुखमरी से। जबकि बच्चों की मां और बूढ़ी दादी ये चीख चीख कर कह रही थीं कि घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है और बच्चों ने पिछले कुछ दिनों से कुछ नहीं खाया था क्योंकि घर का एकमात्र कमाऊ सदस्य बच्चों का पिता जेल में है!

प्रश्न ये है कि क्या अगर बच्चों की मौत किसी रहस्यमयी बीमारी से हुई है तो क्या सरकार और सिस्टम इसके लिए दोषी नहीं है!! सोचने वाली बात यहाँ यही है कि आखिर दूसरा समाचार पत्र यहाँ किसके पक्ष में लिख बोल रहा था और क्यों? आज कल मिडिया से सभी माध्यमों में सबसे अधिक पहुँच वाला कोई माध्यम है तो वो है टेलीविजन। जिस पर तथाकथित न्यूज़ चैनल्स की आज के समय में भरमार है। कुछ रोज़ पहले एक शिक्षक ने हमको बताया कि वो एक न्यूज़ चैनल देख रहे थे जिसमें देश के एक महान न्यूज़ एंकर ये बता रहे थे कि अगर परमाणु हमला हो जाए तो सबको अपने शरीर पर गोबर लपेट लेना चाहिए! वैसे जिस न्यूज़ चैनल पर ये बताया जा रहा था वो न्यूज़ चैनल आज कल स्वघोषित सबसे बड़ा राष्ट्रवादी न्यूज़ चैनल है।

अभी देश में मिडिया की स्थिति हो गई है कि अगर कोई घटना दुर्घटना हो जाए जो राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के जन जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित कर रही हो तो मिडिया आपको साफ़ साफ़ दो फाड़ में नज़र आएगी! एक वो मिडिया जो उस घटना दुर्घटना को लेकर तंत्र को, सरकार को पूर्णतः दोषी ठहराती नज़र आएगी तो दूसरी वो जो उस घटना, दुर्घटना को बड़ी ही बारीकी के साथ सरकार की सफलता या सरकार का पक्ष इस मामले में रखती हुई नजर आएगी जैसे उसमें सरकार की कोई गलती या विफलता नहीं है और सरकार एक दम पाक साफ है या फिर सरकार के पुण्य प्रताप से ही चीजें सम्भव हो पा रही हैं !!अगर संवैधानिक लोकतंत्र को हम एक कुर्सी मान लें और उसके हर अंग को समझना चाहें तो इस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जितनी महत्ता विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की है उससे ज़रा भी कम महत्ता मिडिया की नहीं है बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र की जिस कुर्सी की बात हम कर रहे हैं बिना मिडिया के उस कुर्सी में सिर्फ तीन टांगें ही दिखेंगी और तीन टांगों पर कोई भी कुर्सी टिकी नहीं रह सकती उसके लिए चौथी टांग का होना बहुत ज़रूरी है। संवैधानिक लोकतंत्र में चौथे टांग या पाये का वही कार्य मिडिया का होता है !!

मिडिया की भूमिका क्या है भारत जैसे लोकतान्त्रिक प्रक्रिया वाले देश में ये हम आसानी से समझ जाएंगे जब हम भारत की तुलना चीन जैसे देश से करेंगे जहाँ मिडिया क्या लिखेगी या दिखाएगी ये भी तय सरकार करती है और मिडिया वही छापती या दिखाती भी है !! चीन की मिडिया पर चाइनीज़ सरकार का नियंत्रण है और भारत की बहुसंख्य मिडिया ने अपने आप को सरकार का इसकी नीतियों का खुद को ग़ुलाम बना दिया है !! दोनों देशों की मिडिया के चरित्र में अंतर सिर्फ इतना ही है कि चीन की मिडिया चाह कर भी सरकार की गलत नीतियों के विरुद्ध लिख बोल नहीं सकती जबकि भारत की बहुसंख्य मिडिया ने पता नहीं किस कारण से ये कसम खा ली है कि हम सरकार के खिलाफ कुछ लिखेंगे या बोलेंगे नहीं चाहे समस्या कितनी भी गम्भीर हो !


भारत की मिडिया को इस वक्त अपने चाल, चरित्र और चेहरे पर एक बार गम्भीरता से विचार करना चाहिए, कि वो आखिर किस तरह के भारत के निर्माण के साक्षी और सहयोगी बन रहे हैं क्योंकि आज नहीं तो कल आने वाला वक्त आने वाली पीढियां उनसे सवाल तो पूछेंगी ही कि आखिर वो उस दौर में कर क्या रहे थे?


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