द जनमित्र डेस्क
बक्सर के नगर थाना के पास, महाराजा पेट्रोल पंप के ठीक सामने बनी आदर्श गौशाला की कहानी सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए। अरबों की संपत्ति, मार्केट की चकाचौंध, सरकारी अनुदान और दान की बरसात, फिर भी इस गौशाला की गायें इलाज के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही हैं। गाय के नाम पर सियासत करने वाले जिम्मेदार धृतराष्ट्र की तरह आंखें मूंदे चुपचाप सब कुछ देख रहे हैं, और गौ-सेवा के नाम पर कथित समाजसेवी अपनी जेबें और पेट भरने में मशगूल हैं।





यह गौशाला, जिसकी जमीन पर बना मार्केट करोड़ों की कमाई कर रहा है, वहां गायों की हालत इतनी दयनीय है कि रूह कांप उठे। न बैठने की जगह, न गले में घुंघरू की आवाज। जिंदा रहने की जद्दोजहद में गायें तिल-तिल मर रही हैं, और जिम्मेदारों की खामोशी चीख-चीख कर गौ-सेवा के ढोंग की पोल खोल रही है।
शनिवार की दोपहर, 11-12 बजे के बीच, गौशाला के कैंपस में एक गाय मरी पड़ी थी। कुछ गायों को कमरों में ठूंस-ठूंस कर रखा गया था, तो कुछ बाहर शेड में खड़ी थीं, जहां बैठने की भी जगह नहीं थी। जैसे ही मीडिया के कैमरे की नजर पड़ी, मैनेजर से लेकर सेवादार तक रजिस्टर और कुर्सियां ठीक करने में जुट गए। लेकिन अपनी करतूतों पर पर्दा डालने की उनकी कोशिश नाकाम रही। पुराने हिसाब दिखाकर नए हिसाब समझाने की कोशिश कैमरे में कैद हो गई। जवाबदेही तय करने की बात उठी, तो कई रसूखदारों ने फोन पर मामले को दबाने की सलाह दी, तो कुछ ने हिंदू धर्म की आस्था का हवाला देकर पर्दा डालने की गुहार लगाई।
जब गौशाला के सचिव अनिल मानसिंहका से फोन पर बात हुई, तो उन्होंने बताया कि गाय पिछले तीन दिन से बीमार थी और उसका इलाज डॉक्टर कर रहे थे। दवाएं बाहर से मंगवाई गई थीं। दान के भरोसे गौशाला चल रही है, और चारे से लेकर दवाओं तक का इंतजाम किया जाता है। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि अरबों की संपत्ति, तीन दर्जन दुकानों की कमाई, सरकारी अनुदान और दान के बावजूद गायों की यह दुर्दशा क्यों, तो जवाब टालते हुए उन्होंने मैनेजर की ओर गेंद फेंक दी।

मैनेजर का कहना था कि गाय का इलाज कम्पाउंडर कर रहा था, और दवाएं बाहर से मंगवाई गई थीं। लेकिन जब इलाज की पर्ची मांगी गई, तो उन्होंने रजिस्टर थमा दिया, जिसमें 28 जून 2025 की तारीख में एक बीमार गाय की जानकारी दर्ज थी। मरी गाय के इलाज की जानकारी मांगने पर वह खामोश हो गए। सवाल उठता है कि अगर गाय तीन दिन से बीमार थी, तो उसकी जानकारी रजिस्टर में क्यों नहीं दर्ज की गई? डॉक्टर ने इलाज किया या कम्पाउंडर ने, यह भी साफ नहीं।
मैनेजर के मुताबिक, हर महीने औसतन पांच गायें मर रही हैं। प्रशासन द्वारा पकड़ी गई गायें भी यहीं रखी जाती हैं। गौशाला में कुल 108 गायें हैं, जबकि सचिव के हिसाब से 118। इनकी देखभाल के लिए चार पुरुष सेवादारों को 48 हजार और चार महिला सेवादारों को 32 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता है। मैनेजर को 6 हजार रुपये मिलते हैं, जिनका काम आय-व्यय का हिसाब रखना है।
स्थानीय लोगों की मानें, तो गौ-सेवा की आड़ में मोटी रकम लेकर कटरे बनाए जा रहे हैं। जरूरतमंदों को दरकिनार कर पूंजीपतियों को कटरे दिए जा रहे हैं। गायों की दुर्दशा और गौशाला की बदहाली के बीच, गौ-सेवा के नाम पर चल रहा यह गोरखधंधा अब सबके सामने है। गायों के नाम पर सियासत और समाजसेवा का ढोंग रचने वालों की पोल खुल चुकी है, लेकिन सवाल वही है—आखिर जवाबदेही कब तय होगी?


Comment here