द जनमित्र | शशि
नरबतपुर की मिट्टी में फिर एक बार गर्व और गम का संगम हुआ। चौसा प्रखंड के इस गांव के सपूत, भारतीय सेना के हवलदार सुनील कुमार सिंह (46) को रविवार को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। जम्मू-कश्मीर के राजौरी सेक्टर में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 9 मई की रात पाकिस्तानी ड्रोन हमले में घायल हुए सुनील ने 27 दिन तक जिंदगी से जंग लड़ी, लेकिन 5 जून को उधमपुर के सैन्य अस्पताल में उनकी सांसें थम गईं।

जब रविवार सुबह उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, हर आंख नम थी, हर दिल में गर्व का ज्वार। पत्नी सुजाता अपने छोटे बेटे कृशु के साथ पार्थिव शरीर के पास खड़ी थीं। आंसुओं को थामते हुए उन्होंने कहा, “मुझे अपने पति के बलिदान पर गर्व है।” सुजाता ने शहीद की प्रतिमा और स्मारक द्वार की मांग भी रखी। गांव में जनसैलाब उमड़ पड़ा। ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘सुनील सिंह अमर रहें’ के नारे गूंजे। तिरंगा थामे युवा, बुजुर्ग और ग्रामीणों ने शव यात्रा को तिरंगा यात्रा में बदल दिया, जिसमें देशभक्ति का जज्बा लहरा रहा था।
गंगा घाट पर अंतिम संस्कार से पहले सेना ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। जिलाधिकारी विद्यानंद सिंह और आरक्षी अधीक्षक शुभम आर्य ने पुष्पांजलि अर्पित की। 14 वर्षीय बेटे सौरभ ने कांपते हाथों से पिता को मुखाग्नि दी, तो वृद्ध पिता और छोटे भाई, जो खुद सेना में हैं, ने सैन्य अंदाज में सलामी दी।
पूर्व जिला परिषद सदस्य डॉ. मनोज यादव ने कहा, “चौसा की धरती फिर गौरवान्वित हुई। सुनील जैसे सपूत देश की ताकत हैं।” कांग्रेस नेता पंकज उपाध्याय ने इसे बिहार की शान बताया।
सुनील का जन्म साधारण किसान परिवार में हुआ था। पिता जगनारायण खेतों में मेहनत करते हैं, मां पवढारो देवी रिटायर्ड प्रधानाध्यापिका हैं। छोटे भाई अनिल खेती संभालते हैं, तो सबसे छोटे भाई चंदन भी सेना में हैं और राजौरी में तैनात हैं। सुनील अपने पीछे अपनी पत्नी सुजाता, बेटों सौरभ (14) और कृशु (7) को छोड़ गए। 2002 में सेना की ईएमई यूनिट में भर्ती हुए सुनील का देश सेवा का जज्बा पीढ़ियों को प्रेरित करेगा।

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