जनमित्र/बक्सर/14 नवम्बर 2019
साभार: दीपक कुमार राय
आज नेहरू को याद करना लफ्फाजी वाले
लोकतंत्र का प्रतिपक्ष तैयार करना भी है
जब दुनिया दक्षिण पंथ की ओर झुकी जा रही है,ऐसे में एक ऐसे नेता को याद करना काफी अर्थपूर्ण बन जाता है जिसके वैचारिक झुकाव को असंदिग्ध मानते हुए तीनमूर्ति भवन में एक पेड़ को बाईं ओर झुक जाने के चलते ‘नेहरूवियन ट्री’ कहा जाने लगा। हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आज जयंती है।14 नवम्बर है आज।

पिछले चार पांच वर्षों का समय भारत में डरावने दक्षिणपंथ का समय रहा है। हालांकि नेहरू खुद वाम रुझान रखते थे लेकिन भारत की जो विविधवर्णी, बहु सांस्कृतिक और सर्व समावेशी परम्परा थी उसके आधार पर भारत को उन्होंने एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश के रूप में गढ़ना चाहा। इसके हिन्दू पाकिस्तान बनने देने की संभावनाओं को न्यून से न्यूनतम करने की कोशिश की।
नेहरू बड़े नेता थे। बड़े विज़न वाले नेता थे। विद्वान थे।
और विद्वता उन्होंने अपने अध्ययन और सँघर्षों से हासिल की थी। प्रधानमंत्री का पद पाने के बाद विद्वान नहीं हो गए थे। यही कारण है कि कुछ व्यापारी और स्मृतिहीन किस्म के लोग उन्हें निंदा अभियान के तहत, भारतीय चेतना और जनता के गढने में उनकी भूमिका को बिना जाने, उन्हें बेदखल करने की नाकाम कोशिशों में लगे हैं।
दरअसल, नेहरू को कोई द्वैध, द्वंद्व नहीं था, किसी की खींची लकीर मिटा कर छोटी नहीं करनी थी; एक शिशु राष्ट्र को गढ़ना था। और ऐसे समय मे जैसे नेता की जरूरत थी देश को, नेहरू वैसे ही नेता के रूप में सामने आए। गांधी इसे बखूबी जानते थे पटेल, सुभाष, राजेन्द्र बाबू, सभी जानते थे। क्योंकि वे उस समय की राजनीति और चुनौतियों से परिचित थे। आज के कुछ लफ्फाज नेता तो कुछ भी बोलते रहते हैं क्योंकि वे कुछ भी नहीं जानते। न वे नेहरू के बारे में कुछ भी जानते हैं, न पटेल, न सुभाष किसी के बारे में कुछ भी नहीं। बेनजीर भुट्टो और इंदिरा गांधी के साथ शिमला समझौता करा देते हैं!! खैर नेहरू जितना समय संसद की बहसों में दिया करते थे, इससे लोकतंत्र औऱ लोकतांत्रिक संस्थाओं में उनके यकीन की बानगी मिलती थी।
वे कहते थे, “लोकतंत्र में प्रेस चाहे जितना गैर जिम्मेदार हो जाये मैं उसपर अंकुश लगाने का समर्थन नहीं कर सकता।” देश को एकजुट रखने की शर्तों का अनुसंधान जितना नेहरू ने किया उसी का श्रेय है कि एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में देश विकसित हो सका।

छुआछूत के विरोध में और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के पक्ष में नेहरू अपनी समस्त वैचारिकी के साथ अटल थे। राजे-रजवाड़ों को खत्म करने पर भयानक दबाव उन्हीं का था। अपनी अर्थनीति में मिश्रित अर्थव्यवस्था को लेकर उन्हें कोई भ्रम नहीं था। वह बड़े बड़े उद्योगों को देख पा रहे थे तो सामुदायिक विकास की रूपरेखा भी रख रहे थे। दो खेमों में बंटी हुई दुनिया मे गुटनिरपेक्षता की नीति को लेकर भी उन्हें कोई संशय नहीं था। और भारत की एक विश्वनेता की भूमिका को वे मार्शल टीटो, नासेर और सुकर्णो के साथ मिलकर बखूबी निभा भी रहे थे। अंतराष्ट्रीय मामलों में पंचशील एक बड़ा मीलपत्थर अब भी है। हां, यह भी ठीक है कि चीन के साथ रिश्ते में यह कारगर नहीं रहा। एक बड़े नेता को याद करते हैं तो यह भी याद रखना होगा कि कैसे उसने अपने समय, समाज को परिभाषित और व्यख्यायित किया। उन्होंने सेना को कभी इस तरह से महत्वपूर्ण नहीं बनाया कि वही देश होने लगे। यह कमजोर लोकतंत्र की निशानी है। और इन संदर्भों के साथ भी हमें पाकिस्तान बनने से बचना है।
एक मजबूत लोकतंत्र गढने वाले विजनरी नेता के तौर पर नेहरू को याद करना आज के लफ्फाजी भरे लोकतंत्र का प्रतिपक्ष तैयार करना भी है।


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