द जनमित्र | शशि
डुमरांव शहर का पारंपरिक सिंहोरा आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। सौभाग्य और अखंड सुहाग का प्रतीक माने जाने वाले इस हस्तनिर्मित लकड़ी के गहने की मांग इस बार शादी-विवाह के मौसम में और बढ़ गई है। भोजपुर, रोहतास, पटना, गया के साथ-साथ झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक में सुहागिन महिलाएं इसे शुभ मानकर धारण कर रही हैं।

डुमरांव के खरवार समाज के परिवार सदियों से इस पुश्तैनी कला को जीवित रखे हुए हैं। शहर के बड़का अंगना, छठिया पोखरा और शहीद मर्द मोहल्ला में दर्जनों परिवार आम की लकड़ी पर पारंपरिक चापड़ रंगों से सिंहोरा बनाते हैं। एक कुशल कारीगर पूरे दिन की मेहनत के बाद मात्र 5 से 7 सिंहोरे ही तैयार कर पाता है। लकड़ी काटना, खराद पर आकार देना, घिसाई, प्राकृतिक रंगों से रंगाई और अंत में आकर्षक डिजाइन बनाना – ये सारे चरण पूरी निष्ठा और बारीकी से किए जाते हैं।
लग्न के दिनों में दूर-दराज के थोक व्यापारी डुमरांव पहुंचकर हजारों की संख्या में सिंहोरा खरीदकर ले जाते हैं। कारीगरों का कहना है कि प्लास्टिक और आधुनिक गहनों के दौर में भी पारंपरिक सिंहोरे का क्रेज कम नहीं हुआ है। सुहागिनें आज भी इसे अपनी पहली पसंद मानती हैं।
हालांकि इस पारंपरिक कारोबार के सामने अब कई चुनौतियां हैं। सिंहोरा बनाने में इस्तेमाल होने वाली अच्छी गुणवत्ता वाली आम की सूखी लकड़ी की भारी कमी हो गई है। कारीगर राजेश प्रसाद राजन, सुनील खरवार, विकास खरवार और शिवजी खरवार ने बताया कि कच्चे माल की कमी से उत्पादन आधा रह गया है, जिससे परिवारों की आजीविका पर संकट गहरा रहा है।
सिंहोरा कारोबार से जुड़े करीब दो दर्जन से ज्यादा खरवार परिवारों ने सरकार से मांग की है कि इस पारंपरिक कला को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना में शामिल किया जाए, आधुनिक मशीनों और तकनीक की ट्रेनिंग दी जाए तथा कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष सहायता प्रदान की जाए।
कारीगरों का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह सदियों पुरानी विरासत और इससे जुड़े परिवारों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। फिर भी डुमरांव के कारीगर हार नहीं मान रहे और अपनी पुश्तैनी कला को अंतिम सांस तक जीवित रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं।

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