गांधी तेरे देश में
कल शाम करीब साढ़े सात बजे की यह बात है। हम सभी लोग जोर बाग में डटे हुए थे और जम कर नारे लग रहे थे। सारे साथियों का कहना था कि हम सारी रात यही बैठेंगें।जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जाएंगी हम कहीं नहीं जायेंगे।लेकिन सत्ता के दलालों को ये कहाँ मंजूर था। अचानक पहले एक स्ट्रीट लाईट

बन्द होती हैं फिर सारी स्ट्रीट लाईटें बन्द करके अंधेरे में लाठी चार्ज कर दिया जाता है। भगदड़ के बीच पुलिस वालों का ताण्डव मच जाता है।पुरूष पुलिस यह बिल्कुल नहीं देख रही थी कि यह लड़की है या लड़का। मेरी जानकारी में जब लाठी चार्ज हुआ था उस समय मुझे कोई लेडीज पुलिस नहीं दिखी। कई छात्र- छात्राओं को बुरी तरह मारा गया । एक छात्रा के सर पर तो भयंकर लाठी मारी गई थी।

और साथी शशिभूषण जो दृष्टिबाधित हैं जो वहां से भाग नहीं पाए।पुलिस वालों ने उन्हें बुरी तरह पीटा जो साथी उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे थे उन्हें भी पीटा गया।साथी शशिभूषण अभी एम्स में भर्ती हैं। सभी छात्र अंधेरे में अपनी जान बचा कर भाग रहे थे। कोई गाड़ी के पीछे चुप जाता, तो कोई कहीं दीवाल के पीछे, तो कोई पेड़ के पीछे,जिसको जहां भी जगह मिलती वो वहीं चुप जाता। जैसे ही पता चलता कि पुलिस फिर पीछे से आ रही है दिन भर के थके छात्र फिर भागना शुरू कर देते।ये पुलिसिया आंतक सभी की आखों में साफ़ दिख रहा था । लेकिन इतने सब के बावजूद भी नारों का लगना बन्द नहीं था। सभी छात्र जोर बाग से INA तक (लगभग तीन किलोमीटर) नारे लगाते और भागते ही रहे। ऐसा मंजर मैंने पहले कभी नहीं देखा था कि इस लोकतांत्रिक देश में अपनी बात को कहने की भी आज़ादी नहीं।

मैंने कल JNU छात्रों की सहनशक्ति देखी । किसी भी छात्र ने कोई अराजकता नहीं फैलाई। जबकि सभी छात्र गाड़ियों के बीच से ही भाग रहे थे उन्होंने किसी भी गाड़ी में कोई खरोंच तक नहीं पहुंचाई। लोग कहते हैं छात्र अराजक होते हैं लेकिन कल यह साबित हो गया कि छात्र अराजक नहीं होते, सत्ता अराजक होती है। सभी छात्र बड़े सलीके से अपनी बात रख रहे थे। गाँधीवादी तरीके से सभी अपनी मांगों को उठा रहे थे। फीस वृद्धि के खिलाफ हुए इस प्रदर्शन में पूरे देश के छात्रों को एक जुट होना होगा। यह लड़ाई केवल JNU के छात्रों की ही नहीं बल्कि पूरे देश में बढ़ रही शिक्षण संस्थानों की फ़ीस वृद्धि के खिलाफ सभी छात्रों की है।

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