द जनमित्र | शशि
कैरेबियाई सागर के खूबसूरत देश त्रिनिदाद-टोबैगो में एक बार फिर बिहार की मिट्टी की खुशबू गूंजी है। बक्सर के भेलपुर गांव से निकलीं कमला प्रसाद-बिसेसर ने अपनी पार्टी यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस को शानदार जीत दिलाई है। 28 अप्रैल को हुए चुनाव में उनकी पार्टी ने 41 में से 25 सीटें झटककर साफ बहुमत हासिल कर लिया। सत्ताधारी पीपल्स नेशनल मूवमेंट और स्टुअर्ट यंग को पीछे छोड़ते हुए कमला ने साबित कर दिया कि उनकी सियासी पकड़ अभी भी बुलंद है। अब उनका दोबारा देश का प्रधानमंत्री बनना तय है।




कमला कोई नया नाम नहीं हैं इस देश के लिए। साल 2010 में उन्होंने इतिहास रचा था, जब वह त्रिनिदाद-टोबैगो की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस की कमान संभालते हुए उन्होंने बासदेव पांडे को हराकर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी। 2010 से 2015 तक वह इस पद पर रहीं और अपनी मजबूत छवि बनाई। अब, एक दशक बाद, वह फिर से उसी कुर्सी को संभालने जा रही हैं।
कमला की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं। उनके परदादा रामलखन मिश्र को अंग्रेजों ने बक्सर से जबरन उठाकर गिरमिटिया मजदूर बनाया और कैरिबियाई द्वीपों पर ले गए। दशकों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े उस परिवार की बेटी ने न सिर्फ आजादी की सांस ली, बल्कि उसी देश की सत्ता की चाबी भी अपने नाम की। 2010 में पहली बार पीएम बनकर कमला ने यह साबित किया कि खून में बसी जड़ें कभी कमजोर नहीं पड़तीं।

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कमला का अपनी माटी से लगाव कम नहीं हुआ। शुरू में तो उन्हें यह भी नहीं पता था कि उनके पूर्वज बिहार के किस कोने से आए थे। फिर पुराने कागजातों की छानबीन हुई और सच सामने आया—भेलपुर, बक्सर उनका असली ठिकाना था। सत्ता के शिखर पर बैठीं कमला अपने गांव पहुंचीं। वहां अपने दूर के रिश्तेदारों से मिलीं, तो आंखें छलक पड़ीं। गांव के बच्चों को गोद में उठाया, प्यार से सहलाया और एक बच्चे को अपनी सोने की चूड़ी तक उतारकर दे दी।
इस जीत के बाद कमला एक बार फिर सुर्खियों में हैं। बक्सर की बेटी ने न सिर्फ अपनी जड़ों को सम्मान दिया, बल्कि दुनिया को दिखा दिया कि मेहनत और जुनून के आगे कोई बेड़ियां नहीं टिकतीं। अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि वह सत्ता में लौटकर क्या नया इतिहास लिखेंगी।

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