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छठ: अनुभव,सृजन और संवेदना की सामूहिकता का लोकपर्व।

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दीपक कुमार राय

प्रकृति के साथ मनुष्य के सहअस्तित्व अनुभव,सृजन और सम्वेदना के लोकबोध और सामूहिकता की व्याप्ति का लोकपर्व है छठ।

पांकी,गोबर और माटी की महत्ता को रेखांकित करता लेकिन स्वच्छता को अन्तिमतम स्तरों पर आत्मार्पित करता यह पर्व प्रकृति और मनुष्य के आदिम राग और रागात्मकता पर मुहर भी लगाता है; तब जबकि फल,ईख,गुड़,दूध,नारियल,बांस,केला इत्यादि चीजें अपने मूल रूप में ही इसका हिस्सा हैं और अभिन्न हैं। सूर्य की उपासना के साथ उषा की उपासना भी स्त्री की स्वायत्तता और उपस्थिति को इस पूरे आयोजन में महत्वपूर्ण बनाती है कि “छठी मइया” की पूजा है। हरियर बांस की बहंगिया में सारी दुनिया लिए कमर भर पानी में जा के धंस जाना और केलवा के पात पर कभी सूरुज मल को उतार लें आना;घण्टों की आराधना और फिर सूरज मल को भी जाकर ठेकुआ बांट आना; स्त्री की एकांतिक आराधना के ही बूते की बात है।हालांकि छठ पर्व को राम,सीता,द्रौपदी और मनु तथा अन्य कई मिथकों से जोड़ा जाता है लेकिन उन तमाम मिथकों में से किसी की पूजा इसमें नहीं होती। मूर्ति पूजा यहां नहीं। हालांकि मिथकीयताएँ अर्थों के सम्प्रेषण की व्यवस्थाएं रहीं हैं और संस्कृति इन्हीं अर्थों में अपने को सम्प्रेषित करती चली भी आ रही है। दरअसल,जीवन के खेत में ही उगती रही है लोकसम्वेदना।खेत,खेतिहर;किसान और किसानी के जीवन सँघर्षों और आनंदों का पर्व है छठ। प्रकृति और पुरुष का एक दूसरे में एक दूसरे की भागीदारी का पर्व है यह।कोई पंडा,कोई पुरोहित या कोई बिचौलिया नहीं आता इसमें।सब अपना अपने तरीके से पर्व मना लेते हैं।

छठ के पूरे आयोजन में एक आदिम रंग ढला रहता है;तब का जबकि भेदपरक व्यवस्थाएँ अभी अपने अस्तित्व में नहीं आईं थीं। समानता और समस्तरीयता जिस लोक की विशिष्टता है उसी का ख़ास पर्व है छठ और इसीलिए अभीतक अपने बहुलांश में यह आडंबर,कर्मकाण्डीयता,पाखंड और बाजार के लकदक से बचा हुआ है।बाजार के प्रतिकार में लोक का एकदम से ठेठ ठाट भी है। कईबार बाजार से बेचैन और आक्रांत होकर हम लोक की ओर लौटते हैं तो कर्मकांड,पाखंडवाद,पंडा-पुरोहितवाद, अंधविश्वास की ओर भी लौटते हैं। जबकि लोक हमको आधुनिक बनाये रखता है।हकीकतों के प्रति जागरूक रखता है तो अपने समय और समाज के प्रति संवेदनशील। यह हमेशा समझने की जरूरत है कि अनालोचनात्मक बुद्धि लोकबोध का नाश करती है;लोक विश्वास का नाश करती है और अंधविश्वास को बढ़ाती है।लोकविश्वास कभी भी अकारण नहीं होता।कोई न कोई तर्क तो रहता ही है उसके पीछे। लोक के उन्हीं तर्कों का विस्तार है छठ पर्व।इसीलिए शायद पोथी पतरा मुक्त भी है।जितने लोग उतनी पद्धतियां। और अब तो कई अन्य सामाजिक,सांस्कृतिक,राजनैतिक कारणों से छठ पर्व एक वृहत्तर डायस्पोरा के साथ भी मनाया जा रहा है।उम्मीद करें कि अपना यह लोकपर्वलोक से संपृक्त रहे।

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