द जनमित्र डेस्क
बिहार सरकार के नगर विकास एवं आवास विभाग के निर्देशों के मुताबिक नगर परिषद क्षेत्रों के पुनर्गठन और नए सीमा निर्धारण की प्रक्रिया अब तेज हो गई है। विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को आदेश दिया है कि वे 30 अगस्त तक विस्तृत नक्शे, थाना नंबर, आबादी और चौहद्दी के साथ परिसीमन का अंतिम प्रस्ताव जरूर जमा कर दें।
बक्सर में विस्तारित नगर परिषद का नक्शा तैयार किया जा रहा है। प्रस्ताव आने के बाद प्रारूप अधिसूचना जारी होगी और लोगों को दावे व आपत्ति दर्ज करने के लिए 30 दिन का समय दिया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया 2026 के अंत में होने वाले बिहार के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों से पहले पूरी करनी है, ताकि प्रभावित ग्राम पंचायतों का पुनर्गठन समय पर हो सके।

इसी बीच सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर नगर विकास विभाग द्वारा तैयार करवाए गए एक प्रस्तावित नक्शे की चर्चा तेजी से फैल रही है। इस नक्शे में खुटहा, मझरिया, अर्जुनपुर, रामोबरिया, दहिबर, गड़नी, दलसागर, तिवारीपुर, परसिया, शिवपुर, हरिकिशुनपुर, नदांव, पड़री, साहोपारा, गंगौरा, चुरामनपुर, दरहपुर, शेरपुर, जगदीशपुर, पंडितपुर, सोंधिला, इजरी, हुकहा, रहसीचक, लालगंज, बटवा, मनौवरचक, सरांव, लरई, हरिपुर, उमरपुर, गोबिनापुर, पुलिया, बलिया, लक्ष्मीपुर और मिश्रवलिया समेत कई गांवों को नगर परिषद में शामिल करने का जिक्र है।
हालांकि इसके खिलाफ विरोध की आवाजें उठने लगी हैं। इस प्रस्तावित नक्शे में बक्सर सदर प्रखंड के करीब 80 से 90 प्रतिशत हिस्से को जोड़ने का उल्लेख है। फिलहाल 42 वार्डों वाले बक्सर नगर परिषद में पहले के परिसीमन में अहिरौली, जासो, नुआंव और पांडेयपट्टी जैसे आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को शामिल किया जा चुका है। इस मामले में अधिक जानकारी के लिए संपर्क करने पर कार्यपालक अधिकारी ऋत्विक कुमार ने फोन नहीं उठाया।
बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 के अनुसार किसी क्षेत्र को नगर निकाय में शामिल करने के लिए वहां कृषि में लगे मजदूरों और किसानों की संख्या कुल कार्यबल के 50 प्रतिशत से कम होनी चाहिए। यानी आधी से ज्यादा आबादी व्यापार, मजदूरी या नौकरी जैसे गैर-कृषि कामों में लगी हो। बक्सर के आसपास जिन गांवों को जोड़ने की बात चल रही है, प्रशासन को साबित करना होगा कि वे इस 50 प्रतिशत गैर-कृषि कार्यबल के मानदंड को पूरा करते हैं।
सरकार की व्यापक नीति का मकसद राज्य में शहरीकरण की गति तेज करना है। 2020 के कानूनी बदलावों के बाद राज्य में 116 से अधिक नई नगरपालिकाएं बनीं और कई निकायों का विस्तार हुआ, जिससे बिहार की शहरी आबादी 11.3 प्रतिशत से बढ़कर 15.75 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों और व्यावसायिक केंद्रों के पास स्थित हाट-बाजारों को शहरी निकायों में लाकर केंद्रीय व राज्य वित्त आयोग से ज्यादा विकास फंड हासिल करना चाहती है।
नगर परिषद का हिस्सा बनने पर इन इलाकों में सुनियोजित बुनियादी ढांचा विकसित होगा। ग्रामीणों को कच्ची नालियों और हैंडपंप की जगह पक्की सड़कें, भूमिगत ढकी नालियां, प्रति व्यक्ति 135 लीटर के हिसाब से नल का साफ पानी और आधुनिक एलईडी स्ट्रीट लाइटें मिलेंगी। ठोस कचरा प्रबंधन के नियमों के तहत घर-घर से गीले और सूखे कचरे का वैज्ञानिक तरीके से उठाव शुरू होगा। प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी के तहत बेघर और गरीब परिवारों को पक्के मकान के लिए ढाई लाख रुपये तक की सहायता भी मिल सकती है, जो ग्रामीण आवास योजना से ज्यादा है।
दूसरी ओर नगर परिषद में शामिल होते ही होल्डिंग टैक्स, प्रापर्टी टैक्स, जल कर और व्यावसायिक परिसरों पर शहरी शुल्क लागू हो जाएंगे। किसानों को चिंता है कि नगर निकाय में आने के बाद कृषि सब्सिडी, डीजल अनुदान और पीएम-किसान योजना का लाभ लेने में कानूनी व प्रशासनिक दिक्कतें आ सकती हैं। अपनी जमीन पर मकान बनाने के लिए बिहार भवन उप-विधि के तहत पंजीकृत आर्किटेक्ट से नक्शा पास कराना और विकास शुल्क देना होगा, नहीं तो निर्माण अवैध माना जाएगा।

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