द जनमित्र डेस्क
परंपरागत खेती-किसानी के दायरे से आगे निकलकर किसान अब नई-नई फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। बढ़ती जागरूकता और आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी के चलते गांवों में कृषि का नजारा तेजी से बदल रहा है।
इसी क्रम में बक्सर जिले के सदर प्रखंड के कुल्हड़िया गांव में एफपीओ (फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन) द्वारा मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। पूसा समस्तीपुर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक दयाराम ने कार्यक्रम का नेतृत्व करते हुए सैकड़ों किसानों को मशरूम की खेती और उसकी प्रसंस्करण की आधुनिक विधियों की विस्तृत जानकारी दी।

इस प्रशिक्षण की सबसे उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि पुरुष किसानों के साथ-साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी सक्रिय रूप से शामिल हुईं। महिलाओं की इस उत्साही भागीदारी को देख वैज्ञानिक दयाराम ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज की महिलाएं खेतों से लेकर आर्थिक गतिविधियों तक हर मोर्चे पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। देश की आधी आबादी अब केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक खुद को सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि आत्मनिर्भर बनकर विकास की नई मिसाल कायम करने को तैयार है।
वैज्ञानिक ने बताया कि पारंपरिक धान-गेहूं की खेती से किसानों की आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही है। ऐसे में मशरूम उत्पादन एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है। यह कम निवेश वाली फसल है, जो कम जगह और सीमित संसाधनों में भी अच्छा उत्पादन देती है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय के साथ-साथ पौष्टिक आहार भी उपलब्ध कराया जा सकता है।
कार्यक्रम में शामिल एफपीओ सदस्यों ने बताया कि गांव-गांव में महिलाएं अब मशरूम की खेती के प्रति जागरूक हो रही हैं। वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन करने पर छोटे-से भूखंड या घर के अंदर भी सालाना अच्छी-खासी कमाई की जा सकती है।
एफपीओ के सीईओ दीपू कुमार ने कहा कि मशरूम की खेती की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए विशाल खेतों की जरूरत नहीं पड़ती। भूमिहीन या कमजमीन वाले किसान भी अपने घर के छोटे कमरों में आसानी से इसे कर सकते हैं। कई महिलाएं घरेलू कामों के साथ-साथ मशरूम उत्पादन कर हर महीने हजारों रुपये कमा रही हैं।
इससे न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि पौष्टिक भोजन की उपलब्धता बढ़ रही है। मशरूम उत्पादन कुपोषण की समस्या को कम करने के साथ-साथ गांव की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में भी अहम भूमिका निभा रहा है।
कार्यक्रम के जरिए किसानों में नई उम्मीद जगी है कि विविधीकरण के इस रास्ते पर चलकर वे अपनी आय को दोगुना कर सकते हैं।

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