कुमार नयन ( साहित्यकार )
जनमित्र: जब हम साहित्य शिरोमणि शिवपूजन सहाय को याद करते हैं तो इनकी कृतियों सहित उनके दौर के साहित्यिक परवेश, सोच उनके काल की चुनौतियां, उनके समकालीनों के साथ उनकी सहमतियां-असहमतियां और उनका जीवन संघर्ष हमारे सामने होते हैं. अनायास ही उनके काल-खंड से हमारे समय का तुलनात्मक अध्ययन हमारे मानस में शुरू हो जाता है और तब हमें प्रतीत होता है कि उनके समय की बहुत सी विसंगतियां हमारे समय में नहीं हैं. निश्चय ही ‘दुनिया रोज बनती है’ की तर्ज पर हम आश्वस्त होने लग जाते हैं, किंतु अगले ही पल इंटरनेटी और आभासी दुनिया में यह आभास होते देर नहीं लगती कि उनके समय का यथार्थ उनके व्यक्तित्व में प्रतिबिंबित होता था, उनके समय का चिंतन और संघर्ष उनके माथे पर उभर आई सिलवटों और आंखों की पुतलीयो में साफ-साफ परिलक्षित होता था, जबकि आज के समय का यथार्थ, चिंतन या संघर्ष का पता किसी साहित्यकार के चरित्र, लेखन-कर्म से लग पाना काफी जटिल है. उनकी सादगी (कपड़ों की नहीं, मन की), उनके कर्म को देखकर पाठक या समाज काफी कुछ समझ जाता था और सीख भी जाता था.

वे वचना, कर्मणा एक होते थे. शिवपूजन सहाय, प्रेमचंद, निराला, जयशंकर प्रसाद आदि समकालीनों में सहमतियां-असहमतियां चलती रहती थीं, लेकिन लेखन और जीवन जीने के तरीके बहुत ईमानदारी पूर्ण थे. आज जो घोषित है, वह उसके अनुरुप नहीं भी हो सकता है. साहित्य के लिए जीने-मरने का संकल्प लेने वाला व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा, पैसा पाने की तिकड़मों में भी लिप्त हो सकता है. लेखक होने का दंभ, नामचीन साहित्यकार होने का गुरुर, कॉम्पलेक्स आम आदमी सहज ही भांप लेता है और उसे लगने लगता है कि मंत्रियों, विधायकों, सांसदों, पदाधिकारियों में से अधिकांश की तरह ही अक्सर यह लेखक, कवि नामक जीव भी होता है. बस यहीं पर साहित्य आंसू बहाने लगता है. एक अच्छी दुनिया का अच्छा आदमी बुरी दुनिया का बुरा आदमी बन जाता है. हम आज

जरूर आगे बढ़े हैं, समझ में भी, अपने विमर्शो में भी, फिर भी एक जगह है जहां से हम पीछे खिसके हैं. साहित्य की तमीज, उसका चरित्र, उसका बेबाकपन, उसकी साफगोई, उसका जोखिम, खुद को सायास प्रतिष्ठित होने से बचने का प्रयोजन और दुनिया को बेहतर बनाने के लिए संघर्षों में भागीदारी की कमी आई है. साहित्य में लोकतंत्र और विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है, किंतु व्यक्तिवादीता, गुटबाजी, नए, अच्छे साहित्यकारों की अनदेखी की प्रक्रिया भी तेज हुई है. आज तसलीमा नसरीन के पक्ष में खुलकर आने वाले साहित्यकारों की संख्या नगण्य है. मजे की बात यह है कि जिन मूल्यों को ये साहित्यकार साथ लेकर लेखन-कर्म करने का दावा कर रहे हैं, उन्हीं मूल्यों के लिए तसलीमा जान पर खेल रही है. ‘दुनिया को

सिर्फ हम बदल सकते हैं, कोई और नहीं’ की तर्ज पर ये साहित्यकार तसलीमा को भला दुनिया बदलते कैसे देख सकते हैं! इसमें स्वयं के कमतर दिखने या हो जाने का भय जो सता रहा है. खैर, जो भी हो, लेकिन शिवपूजन सहाय के रचना-काल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि उस समय आज जैसे साहित्य के मठाधीश नहीं थे और अगर थे भी तो समाज या पाठक वर्ग उसकी परवाह नहीं करते थे. वे साहित्य को मनुष्यता का पर्याय मानते हुए सादगी, बेबाकपन, बिंदासपन और एक रेखीय जीवन पर खुलकर अपनी जान छिड़कते थे. हमारे लिए यह सुखद व उत्साहवर्धक संयोग है कि शिवपूजन सहाय बक्सर जिले के ‘उनवास’ गांव के थे जो जिला मुख्यालय से 20 किमी की दूरी पर है. अपने जीवन-काल में उन्होंने यह दूरी अधिकांशत: पैदल ही चलकर तय की है. एक तरफ उनका आंचलिक उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ दूसरी तरफ भाषा को परिष्कृत करती उनकी पुस्तक ‘व्याकरण दर्पण’ से

जब हम गुजरते हैं तो हमें अपने बौनेपन का एहसास हर तरफ से अनुशासित करता सा लगता है. उनका रचना-संसार बहुत बड़ा या विस्तृत नहीं है, किंतु वे प्रेमचंद के ‘गोदान’ जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ से लेकर अनेक साहित्यकारों की कृतियों में रचे-बसे हैं. ऐसे साहित्यिक मनीषी को हमारे जनपद के बुद्धिजीवी ही नहीं आम आदमी भी गहराई से जाने, पहचानें, माने इसी उद्देश्य से बक्सर के कुछ साहित्यिक और प्रगतिशील मित्रों ने मिलकर “आचार्य शिवपूजन सहाय स्मृति शोध संस्थान” के बैनर तले सन् 2011 से ‘आचार्य शिवपूजन सहाय सम्मान’ की शुरुआत की, जिसके तहत हर दो वर्ष पर हिंदी के किसी लेखक-पत्रकार को यह सम्मान प्रदान किया जाता है. यह हमारे जनपद तथा संपूर्ण हिंदू समाज के लिए प्रसन्नता एवं गर्व की बात होनी चाहिए.



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