अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
द्वारा :- डॉ दीपक कुमार राय
स्वतंत्र स्त्री हमेशा से ही पुरुष सत्ता के समक्ष सबसे खतरनाक चुनौती रही है। गार्गी हो तब,द्रौपदी हो तब,या फिर मित्रो हो तब। क्योंकि वे टेसुवे नहीं बहातीं, वे सवाल करतीं हैं; किसी व्यक्ति से नहीं, पूरी व्यवस्था से। वे ‘दी हुई आज़ादी” और उसकी तय परिधि में जीने से इनकार करती हैं।

औरत के इसी इनकार कर सकने की ताकत को
तोड़ने,दहन-दलन एवम काम कुचलनों-विचलनों
की दिल दहला देने वाली कहानियों से भरा पड़ा है, हमारा “दिव्य-भव्य” इतिहास।
“यंत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते” के शोर में और सतीत्व के घण्टा-घड़ियाली उन्मदि में, स्त्री के सारे जेन्युइन प्रश्न या तो स्थगित किये जाते रहे या दबाए जाते
रहे। स्त्रीत्व का समग्र बोध देह में ही सिमट दिया गया और लार टपकाती लालसाएं उसकी जांघ और जीभ के बीच मीज़ान बैठाती रहीं।
स्त्री का अस्तित्व,उसकी सारी अस्मिता,उसका सारा विमर्श ‘देहवाद’के धूमग़ज़्ज़र में दम तोड़ता
रहा। फरेबी बाजार ने,उपभोक्तावाद ने तो स्त्री देह को ऐन्द्रिक लालसाओं की नोक पर ही रख दिया
है। यौनाकांक्षा की लपटें और यौनांगों की तानाशाही देह की शुचिता पर “बलात्कार” नामक ब्रह्मास्त्र को
धार देती है और यदि किसी स्त्री को बेगैरत करना है तो बलात्कार को पुरुष सत्ता का संस्कार सम्मत
उपकरण भी बना देती है।

बलात्कार है भी एक ऐसी बला जिसकी आशंकाओं के बीच अनुकूलित होते जाना स्त्री जीवन का एक
दारुण सच है। बहुत सुनियोजित तरीके से यह व्यवस्था बलात्कार सम्भव हो सकने लायक परिस्थितियां बनाती है। आखिर बाजार के तमाम विज्ञापन स्त्री देह को परोसने की कवायद तक ही क्यों सिमटे नजर आते हैं। यह स्त्रीलोक में एक साजिश है और यही व्यवस्था एक बलात्कृत औरत का जीना हराम कर देती है। यह स्त्री जीवन मे मृत्यु के क्षणों का ‘एनलार्ज’ हो जाना है।

मर्दवादी वर्चस्व की बेशर्मी ने बलात्कार को ऐसी दुर्घटना बना दिया है जिसके बाद स्त्री का मर जाना ही श्रेयस्कर हो जाता है। यह जो “शुचिता” का पारंपरिक बोध है, यह स्त्री की पीठ पर टिका हिमालय है, जिसमे सदियों से पिस कर सांस-सांस मरती रही है स्त्री। शुचिता के इस साजिशी अनुकूलन ने स्त्री को भी इस कुकृत्य की अपेक्षा अपनी देह से ही घृणा करना सिखा दिया। और सिर्फ इसीलिए इस शर्मनाक कृत्य, इस वहशत को छिपाना ही किसी भी बलात्कृत स्त्री का परम धरम बन जाता है। असल मे स्त्री देह बड़ी आसान शिकार है कि किसी का मान मर्दन करना हो तो उसकी, बेटी, बहन, पत्नी, माँ किसी का भी देहमर्दन कर दो। यह आदिम परंपरा भी स्त्री देह पर भारी बीतती है। दरअसल, बलात्कार हमेशा से ही यौनिक विस्फोट का मामला कम और पुरुष हिंसा का मामला अधिक रहा है। हमारा पूरा समाज जैसे हिंसा की अतिव्याप्ति का शिकार है, बलात्कार उसकी एक सर्वाधिक घृणित अभिव्यक्ति है।
मर्दवाद की दिक्कत यह है कि पहले तो वह देह का तिलिस्म रचता है, फिर उसे तोड़ता है और देह जीत लेने का बड़ा बजबजाता सा जश्न मनाता है।

आज भूमंडलीकरण के उदारवादी एलियनेशन एवम बाजार के कामाक्रान्त देहोत्सव में जिस तरह दृश्यरति की कोटिक छवियाँ मनुष्य की आदिम आखेट वृत्ति की आग में घी की तरह छन छन उतरती चलीं जाती हैं; हिंसक वासना तो लपलापायेगी ही।


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