द जनमित्र डेस्क
चौसा (बक्सर)। रेल कॉरिडोर के लिए किसानों से सहमति मिलने संबंधी प्रकाशित खबर को भ्रामक बताते हुए प्रभावित किसान खेतिहर मजदूर मोर्चा ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया है। मोर्चा का कहना है कि अतिरिक्त 65 एकड़ भूमि में से 42 एकड़ पर सहमति मिलने का दावा आधारहीन है।

मोर्चा के अनुसार आठ अगस्त को अखौरीपुर गोला स्थित एमसी कॉलेज में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई वीडीएसी बैठक के बाद नौ अगस्त को बनारपुर गांव के शिव मंदिर परिसर में प्रभावित किसानों और स्थानीय लोगों की बैठक हुई। इसमें वीडीएसी बैठक और प्रकाशित समाचारों की समीक्षा की गई।
मोर्चा ने स्पष्ट किया कि बैठक में प्रभावित किसानों की नौकरी, पुनर्वास व पुनर्स्थापना, नियमित गारंटी, वार्षिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा प्रभावित गांवों के विकास जैसे लंबित मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए थी। इसके बजाय रेल कॉरिडोर के लिए भूमि उपलब्ध कराने पर ज्यादा जोर दिया गया।
रेल कॉरिडोर के लिए पहले करीब 137 एकड़ भूमि अधिसूचित हो चुकी है। अलाइनमेंट में बदलाव के कारण अब लगभग 65 एकड़ अतिरिक्त भूमि चिह्नित होने की बात कही जा रही है। मोर्चा का आरोप है कि इस अतिरिक्त भूमि के बारे में किसानों को स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई और उनकी वैध सहमति भी नहीं ली गई।
समाचार में 65 एकड़ में से 42 एकड़ भूमि पर सहमति मिलने का जिक्र है। मोर्चा इसे स्वीकार नहीं करता और प्रशासन से मांग करता है कि मौजावार तथा रैयतवार लिखित सहमति का प्रमाण सार्वजनिक किया जाए। मोर्चा का यह भी कहना है कि जेएमएस के नाम पर पर्याप्त पूर्व सूचना दिए बिना किसानों की जमीन पर पिलर गाड़कर कब्जा करने की कोशिश हो रही है, जिसका विरोध भी किया जा रहा है।
वीडीएसी बैठक में यह सवाल भी उठा कि चौसा स्थित एसटीपीएल की नौकरियों का विज्ञापन शिमला से जारी होता है, जबकि जमीन स्थानीय किसानों से ली गई है। परियोजना में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण है, लेकिन प्रभावित परिवारों के युवाओं के लिए स्पष्ट रोजगार प्राथमिकता का कोई प्रावधान नहीं है। इस पर संबंधित अधिकारियों से कोई ठोस जवाब नहीं मिला।
मोर्चा की मांग है कि एसटीपीएल की सभी रिक्तियों में प्रभावित परिवारों के योग्य युवाओं को प्राथमिकता दी जाए, स्थानीय स्तर पर विज्ञापन प्रकाशित हों और प्रभावित परिवारों की सूची के आधार पर विशेष भर्ती अभियान चलाया जाए। मुख्य परियोजना की करीब 1065 एकड़ भूमि से प्रभावित परिवारों के रोजगार, पुनर्वास और अन्य वादे सालों बाद भी अधूरे पड़े हैं। नए आश्वासनों से पहले पुराने वादों को पूरा किया जाना चाहिए।
मोर्चा का स्पष्ट संदेश है कि चौसा का किसान विकास का विरोधी नहीं है, लेकिन अपनी जमीन, अधिकार और भविष्य की कीमत पर विकास को स्वीकार नहीं करेगा। गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाकर किसानों को उनके भूमि, मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार संबंधी अधिकारों के प्रति सचेत किया जाएगा तथा सभी मुद्दे लोकतांत्रिक व कानूनी तरीके से उठाए जाएंगे।

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