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वाटर ट्रीटमेंट प्लांटः सिर्फ उद्घाटन हुआ, प्यास नहीं बुझी

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द जनमित्र डेस्क

बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड में भारी लागत से बनाए गए विशाल वाटर ट्रीटमेंट प्लांट ने हजारों ग्रामीणों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। भीषण गर्मी में भी यहां के लोग शुद्ध पेयजल के लिए अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। सरकार ने इस योजना को आर्सेनिक मुक्त जल क्रांति का नाम दिया था, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है। महादलित बस्तियों में बच्चे चर्म रोग से जूझ रहे हैं और महिलाएं दूषित पानी को छान-छानकर इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।

यह परियोजना सिमरी प्रखंड की 15 और बक्सर सदर की 5 पंचायतों के 51 गांवों में फैले 214 वार्डों के करीब 36 हजार परिवारों को गंगा का शुद्ध जल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। 15 फरवरी 2025 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसका उद्घाटन किया और दावा किया कि हर घर तक नियमित पानी पहुंचेगा। लेकिन अब जमीनी सच कुछ और बयां कर रहा है।

परियोजना की शुरुआत 2009 में हुई थी, जब तत्कालीन पीएचईडी मंत्री अश्विनी चौबे ने 112 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से आधारशिला रखी। हैदराबाद की एक कंपनी को काम सौंपा गया, लेकिन आरोप है कि कंपनी अधूरा काम छोड़कर भुगतान लेकर गायब हो गई। बाद में दोबारा टेंडर प्रक्रिया हुई और कुल 202 करोड़ 70 लाख रुपये खर्च कर प्लांट तैयार किया गया।

स्थानीय स्तर पर जांच में चौंकाने वाली स्थिति सामने आई। केशोपुर और पांडेयपुर जैसे गांवों में पाइपलाइन तो कई घरों तक पहुंच गई, लेकिन नल से एक बूंद पानी नहीं निकल रहा। जिन घरों में कनेक्शन नहीं पहुंचा, वहां के लोग अब भी आर्सेनिक युक्त हैंडपंपों पर निर्भर हैं।

पांडेयपुर के त्रिवेणी दुबे बताते हैं कि सैकड़ों आवेदन और शिकायतों के बावजूद पानी नहीं मिला। अब अधिकारियों का कहना है कि लोग खुद पाइप खरीदकर खर्चा दें, तभी कनेक्शन दिया जाएगा।

महादलित बस्ती में स्थिति और बदतर है। भुवर मुसहर कहते हैं, “पाइप पहुंचा तो है, पर नल सूखा पड़ा है। मजबूरी में वही जहरीला पानी पीना पड़ रहा है, जिससे त्वचा की बीमारियां फैल रही हैं।” नट समाज की सुगवंती देवी भी यही दर्द बयां करती हैं। उनके बस्ती का एकमात्र हैंडपंप ही सहारा है, जहां पानी इतना दूषित है कि बर्तनों पर जंग जैसी परत जम जाती है।

प्लांट पर तैनात केमिस्ट रियाजुद्दीन अंसारी दावा करते हैं कि सुबह-शाम तीन-तीन घंटे पानी की सप्लाई हो रही है। उन्होंने बताया कि चार स्तर की फिल्ट्रेशन और जांच के बाद पानी गांवों में भेजा जा रहा है। प्लांट में तीन बड़े प्री-सेटलिंग टैंक हैं, जिनकी कुल क्षमता 1.2 करोड़ लीटर है।

लेकिन ग्रामीण इन दावों को सिरे से खारिज करते हैं। केशोपुर पंचायत के बीडीसी प्रमोद मिश्रा इसे “उद्घाटन प्लांट” करार देते हुए कहते हैं कि प्लांट के सबसे करीब होने के बावजूद पंचायत के मात्र 10 प्रतिशत घरों में ही कनेक्शन पहुंच पाया है।

सिमरी को दुनिया के सबसे ज्यादा आर्सेनिक प्रभावित इलाकों में शुमार किया जाता है। ऐसे में अगर समय रहते सभी घरों तक शुद्ध पानी नहीं पहुंचा तो यह पूरी परियोजना अपने मकसद में नाकाम साबित होगी।

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