द जनमित्र डेस्क
लंबे समय से ताले में बंद और करोड़ों के उपकरणों के साथ धूल खा रहा बक्सर सदर अस्पताल का दस बेड वाला सघन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) अब शुरू होने के कगार पर है। हालांकि, इसके शुभारंभ से पहले ही एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया है। स्वास्थ्य महकमे ने आईसीयू की देखरेख के लिए चार होम्योपैथ और आयुर्वेद (आयुष) चिकित्सकों को तैनात करने का फरमान जारी किया है। इस फैसले के बाद से ही क्रिटिकल केयर में मरीजों की सुरक्षा और आपातकालीन स्थिति में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

विदित हो कि सघन चिकित्सा कक्ष सामान्य वार्डों की तुलना में अत्यधिक संवेदनशील होता है। यहां पल-पल में मरीजों की स्थिति बिगड़ सकती है, जिसके लिए तत्काल एलोपैथिक हस्तक्षेप और त्वरित मेडिकल फैसलों की दरकार होती है। ऐसे नाजुक हालात में गैर-एमबीबीएस चिकित्सकों के हाथों में मरीजों की कमान सौंपे जाने से यह संशय पैदा हो गया है कि अंतिम समय में जीवन रक्षक फैसला आखिर कौन लेगा।
इस पूरी व्यवस्था को लेकर स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता रामजी सिंह ने गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका स्पष्ट कहना है कि उन्हें किसी विशेष चिकित्सा पद्धति से ऐतराज नहीं है, लेकिन आईसीयू का मतलब महज एक साइनबोर्ड टांगना नहीं होना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि ड्यूटी पर लगाए जाने वाले चिकित्सकों के अनुभव और योग्यता को सार्वजनिक किया जाए ताकि लोगों को गुणवत्तापूर्ण इलाज का भरोसा मिल सके। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता डॉ. स्नेहाशीष वर्धन ने भी स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने आयुर्वेद व होम्योपैथी के जानकारों को आईसीयू जैसी संवेदनशील जगह का प्रभार सौंपने को राज्य की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था का जीता-जागता उदाहरण करार दिया है।
विवाद को बढ़ता देख बक्सर के सिविल सर्जन डॉ. शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती ने मामले में सफाई पेश की है। उन्होंने स्वीकार किया है कि फिलहाल अस्पताल में एमबीबीएस चिकित्सकों का भारी टोटा है। सिविल सर्जन के अनुसार, मरीजों के मुख्य इलाज और उनकी निगरानी की पूरी जिम्मेदारी संबंधित एलोपैथिक (एमबीबीएस) डॉक्टर के कंधों पर ही होगी, जबकि आयुष चिकित्सक केवल उनके सहयोगी की भूमिका निभाएंगे। हालांकि, कौन सा विशेषज्ञ डॉक्टर किस वक्त मौजूद रहेगा, इसका कोई स्पष्ट खाका अब तक पेश नहीं किया गया है।
स्थानीय युवाओं और जन प्रतिनिधियों के भारी दबाव व विरोध-प्रदर्शन के बाद सालों से धूल फांक रही जीवनरक्षक मशीनें अब चालू तो होने जा रही हैं, लेकिन मरीजों के परिजनों के मन में यह खौफ अब भी बरकरार है कि क्या आपात स्थिति के वक्त कोई योग्य विशेषज्ञ वाकई उनके लिए मौजूद रहेगा। अब यह पूरा मामला महज दो अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों का न होकर सीधे तौर पर मरीजों की जिंदगी, सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का बन चुका है। प्रशासन को जनता का भरोसा जीतने के लिए अपनी ड्यूटी व्यवस्था को अविलंब पारदर्शी बनाना होगा।

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