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दुबई में फंसे दो युवकों के परिवार चिंता में, होली की रौनक फीकी

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द जनमित्र डेस्क

खाड़ी क्षेत्र में इजरायल-ईरान संघर्ष और बढ़ते तनाव ने हजारों किलोमीटर दूर बिहार के बक्सर जिले के छोटे से बनारपुर गांव को भी अपनी चपेट में ले लिया है। गांव के दो युवक—सुजीत सिंह और संतोष कुशवाह—दुबई में मजदूरी कर परिवार की आर्थिक तंगी दूर करने गए थे, लेकिन अब मिसाइल हमलों और युद्ध की खबरों ने उनके घरों में डर और बेचैनी का माहौल बना दिया है।

होली का त्योहार गांव में इस बार बिना रंग-गुलाल के बीत गया। घरों में न तो रंग खरीदे गए, न ही पकवान बने। हर तरफ सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है—’हमारा बेटा कब सुरक्षित घर लौटेगा?’

सुजीत सिंह के पिता रामप्रवेश सिंह खेतों में मजदूरी कर रहे थे, जब उन्हें पता चला कि मीडिया उनके बेटे के बारे में पूछने पहुंची है। फावड़ा फेंककर वे दौड़ते हुए घर लौट आए और भावुक होकर पूछने लगे, “बाबू, वहां की नई खबर बताइए, सुजीत ठीक तो है न?”

सुजीत की मां पन्ना देवी ने आंसू पोछते हुए बताया, “बेटा फोन पर कहता है—मां, चिंता मत करो, मैं ठीक हूं। लेकिन मिसाइल कैंप से सिर्फ दो किलोमीटर दूर गिरी है। मां का दिल कैसे माने?” उन्होंने कहा, “जब तक बेटा घर नहीं लौटेगा, तब तक हमारे घर का रंग फीका ही रहेगा। होली अगली बार मनाएंगे, जब पूरा परिवार साथ होगा।”

सुजीत पिछले साल 28 अगस्त 2025 को दुबई गया था। परिवार की गरीबी मिटाने, घर बनाने और बहन की शादी के लिए वहां मेहनत कर रहा था। अब हर मिसाइल हमले की खबर पर परिवार की सांसें थम सी जाती हैं।

इसी गांव का दूसरा युवक संतोष कुशवाह भी दुबई में है। उसके पिता नंदलाल सिंह की आंखें नम हो जाती हैं। वे बताते हैं, “बेटा बोला—कैंप से दो किलोमीटर पर बम गिरा है। हमने कहा लौट आओ, तो बोला अभी व्यवस्था नहीं है। जो सबका होगा, वही हमारा होगा।” संतोष की मां कमलावती देवी कहती हैं, “हमारा इकलौता बेटा है। भगवान से बस यही मन्नत है कि सुरक्षित लौट आए।”

गांव में इस बार होली की कोई रौनक नहीं दिखी। चौपाल पर बुजुर्ग बैठे खाड़ी की खबरें देखते हैं। दुकानदारों ने बताया कि रंग-गुलाल की बिक्री आधी से भी कम रही। लोग कहते हैं, “जब बेटे खतरे में हैं, तो खुशी कैसे मनाएं?”

परिवार सुबह-शाम दीया जलाते हैं, दुआएं मांगते हैं। पिता खेत कम जाते हैं, फोन के पास बैठे रहते हैं कि कहीं बेटे का कॉल आ जाए। गांव वाले कहते हैं, “घर की गरीबी मिटाने विदेश गए थे, अब घरवाले ही परेशान हैं। सरकार को इन बच्चों को जल्द वापस बुलाना चाहिए।”

बनारपुर में सिर्फ ये दो परिवार नहीं, पूरा गांव चिंतित है। कई युवक कुवैत, कतर और दुबई में हैं। बुधवार सुबह 20-25 लोग इकट्ठा होकर मोबाइल पर युद्ध की खबरें देख रहे थे। हर हमले पर डर की लहर दौड़ जाती है।

एक बुजुर्ग ने कहा, “युद्ध में कोई सुरक्षित नहीं। बस भगवान करे, हमारे बच्चे सलामत लौट आएं।”

युवकों ने वीडियो कॉल पर बताया कि वे कैंप में सुरक्षित हैं, हालात सामान्य हैं। लेकिन गांव की बेचैनी कम नहीं हो रही। माताएं कहती हैं, “बेटे की आवाज में भी डर झलकता है।”

बनारपुर की इस होली में रंगों की जगह उम्मीद, दुआएं और इंतजार छाया है। पूरा गांव एक सुर में बोल रहा है—ईश्वर करे, दोनों युवक सही-सलामत घर लौट आएं। बाकी त्योहार बाद में मनाएंगे।

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